kiss a tale एक कथा को चूमें, और खुशी से झूमें हम ... क़िस्से ठिलाते, खिलखिलाते - एक प्यारी सी अनुभूति, पॉडकास्ट, दृश्य-श्रव्य, कथन-श्रवण...

Monday, May 13, 2024

मुनीम जी (रेडियो नाटक)

मुनीम जी (रेडियो नाटक)

पूजा अनिल

पूजा अनिल


पात्र
प्रताप सिंह: (एक खुशमिजाज़ बुजुर्ग)
आदर्श कुमार (प्रताप सिंह का पुत्र)
मुकेश कुमार (प्रताप सिंह का दोस्त)
सिमरन (उर्फ़ मुनीम जी - आदर्श कुमार की सी ए)
बच्चा (वीर सिंह - सिमरन का पुत्र)
सूत्रधार (यदि आवश्यकता पड़े)
***

दृश्य 1 आदर्श के ऑफिस में प्रताप सिंह बात कर रहे हैं।
प्रताप सिंह: वो तेरी मुनीम जी चलीं गईं?
आदर्श कुमार: ओह पापा! शी इज़ ए 'सी ए' नॉट एनी 'मुनीम जी'। वह हमारी कंपनी के अकाउंट देखती है।
प्रताप सिंह: ओह पुत्तर, समझा कर! इक्को गल है! मैं ता ओल्ड मैन हाँ!
आदर्श कुमार: यू आर नॉट दैट मच ओल्ड! अब इतने भी पुराने नहीं हो आप कि 'सी ए' न कह सकें!!
प्रताप सिंह: क्या बात करते हो बेटा, सत्तर साल का हो गया हूँ, ओल्ड तो हूँ। अब तो तुम भी छत्तीस के हो गए हो!
आदर्श कुमार: अरे पापा! ज़माने की बात कही मैंने, आप तो उम्र गिनाने लगे! (खीझकर) और आप बार-बार मुनीम जी कहकर मेरी दीदी की याद दिलाते हैं! (उदास स्वर में)
प्रताप सिंह: अच्छा अच्छा! परेशान न हो, अब मैं चलता हूँ। (रूँआसे होते हुए कहते हैं)
आदर्श कुमार: हाँ, हाँ, आप घर चलो, मैं थोड़ा काम निपटा कर आता हूँ।
प्रताप सिंह: ठीक है बेटा जी।
(पदचाप और दरवाज़े खुलकर बंद होने की आवाज़)

दृश्य 2 - अगले दिन
प्रताप सिंह: देखिए मुनीम जी, आप लगातार ऐसे ही स्क्रीन देखते रहोगे तो अकाउंट का काम कब करोगे? (नकली रोष का स्वर)
सिमरन: बट सर, आय एम ऑलरेडी वर्किंग ऑन अकाउंट्स। (तसल्ली का स्वर)
प्रताप सिंह: झूठ! एकदम झूठ! न कलम है न काग़ज़ है, किधर काम कर रहे हो?
सिमरन: सर, आजकल सारा काम कम्प्यूटर पर ही होता है, काग़ज़ कलम तो बस फ़िल्मी गीतों में ही सुनाई देते हैं।
प्रताप सिंह: देखिए मुनीम जी, हमें कमअक्ल समझा है क्या? हमने भी दुनिया देखी है, ये बाल यूँ ही नहीं उड़ गए!
(हँसी का ऑडियो)
सिमरन: सर, आप यह देखिए न…. सब काम एकदम सही सही चल रहा है।
प्रताप सिंह: हाँ हाँ! दिखाओ मुझे ही! मुझे ही देखना है तो फिर मुनीम जी रखने की क्या ज़रूरत है? मैं ही कर लेता हूँ सब काम!

दृश्य 3 बेटे का प्रवेश
आदर्श कुमार: पापा! पहली बात तो यह मुनीम जी नहीं 'सी ए' है, 'सी ए'!!! और दूसरी बात, आप उसे काम करने दीजिए, क्यों अपनी बातों में उलझा रहे हैं?
प्रताप सिंह: आप आ गए बेटा जी, चलो, अब हमारी ड्यूटी हुई ख़तम... लो सम्भालो अपना ऑफिस, हम तो जा रहे हैं सैर करने अपने दोस्त मुकेश कुमार के साथ... समोसा - जलेबी भी खाएंगे, आपके लिए और मुनीम जी के लिए भी ले आऊं क्या?
आदर्श कुमार: न न, कोई ज़रूरत नहीं पापाजी, आप जाकर सैर और नाश्ता कीजिये, हम यहीं नाश्ता मंगवा लेंगे। और हाँ, आप तला हुआ नाश्ता अधिक मत खा लेना, फिर मम्मी जी से चुगली करने की नौबत न आये!
प्रताप सिंह: आहो! आहो! चिंता न करो बेटा जी! लो, मुकेश कुमार का ही कॉल आ गया!
(फ़ोन की घंटी बजती है, और वे अपनी बात ख़तम किये बिना ही फ़ोन पर बात करना शुरू हो जाते हैं।)
प्रताप सिंह: हेलो हेलो! भाई मुकेश कुमार , आवाज़ आ रही क्या मेरी?
मुकेश कुमार: हाँ भाई प्रताप सिंह, आ रही है तेरी आवाज़। चल आजा भाई, नीचे उतर, मैं तेरे ऑफिस के नीचे ही खड़ा हूँ।
प्रताप सिंह: हाँ हाँ भाई, रुक वहीँ, इक मिन्ट में आता हूँ।
आदर्श कुमार: सॉरी सिमरन! पापाजी को बहुत बार मना किया है लेकिन वे तुम्हे मुनीम जी ही बुलाते रहते हैं, कितना भी समझाओ मगर वे मानते ही नहीं!
सिमरन: कोई बात नहीं सर, मुझे उनका प्यार से मुनीम जी कहना बड़ा अच्छा लगता है। ऐसा लगता है कि कोई बहुत दिल से मुझे बुला रहा है।
आदर्श कुमार: चलो, ठीक है, अगर तुम्हे कोई ऐतराज़ नहीं तो अब से उनसे कुछ न कहूंगा। ब्रेकफास्ट कर लें, आओ।
(दोनों हलकी सी हँसी हँसते हैं और जाते हैं।)
(क़दमों की आवाज़ आती है।)

दृश्य 4
(प्रताप सिंह नीचे उतर आता है, मुकेश कुमार से मिलता है, चलते चलते बात करते हैं दोनों।)
प्रताप सिंह: भाई, आज कौन सा नया रास्ता चलेंगे पैदल करने के लिए?
मुकेश कुमार: आज वो सिनेमा वाले रोड से चलेंगे, वहीं से सीधा गार्डन पहुंचेंगे।
प्रताप सिंह: ठीक है भाई, चल. उधर तो अपने वारे न्यारे हैं, मस्त मस्का पाव मिलेगा और गुलाब जामुन भी!
मुकेश कुमार: ओये प्रतापे! तू अपनी सेहत का ख्याल रख और यह सब खाने के सपने देखना बंद कर दे, घर चल कर भाभी जी को तो मुझे ही जवाब देना पड़ेगा न!
प्रताप सिंह: अरे भाई मुकेश कुमार, चुप कर ओये! अभी तो मजे करने दे भाई, घर पहुँच कर देखा जायेगा। तेरी भाभी तस्वीर में टंगी हुई भी सबको अपनी मुट्ठी में रखे हुए है! और हम जो ज़िंदा हैं तो कोई कदर ही नहीं किसी को! हुंह!!
मुकेश कुमार: हा हा! अच्छा, चल, जी भर के खा लेना लेकिन आज पूरा चक्कर लगाना है सिनेमा रोड का, तू बीच में ही लौटने का मत कहना! समझ गया न?
प्रताप सिंह: न न, बिल्कुल न कहूंगा! आज तो जिसे देखो, वही हुकुम चला रहा है मुझ पर!!! हुंह!!!
मुकेश कुमार: ओये! तू तो राजा साहब है प्रतापे ! तुझ पर किसने हुकुम चलाया भाई? इतनी हिम्मत किसकी हुई?
प्रताप सिंह: वो है न तेरा लाडला भतीजा आदर्श! अपने पिता को हमेशा आदर्श राह पर ही चलना सिखाता रहता है घोंचू!
मुकेश कुमार: अच्छा! क्या कहा उसने?
प्रताप सिंह: बोलता है कि तला हुआ ज़्यादा न खाऊँ! अब चार दिन बचे हैं जीवन के, उसमें भी जीने न देगा, भला ये भी कोई बात हुई? हुंह!!
मुकेश कुमार: अरे भाई, ठीक ही तो कहा उसने, तू तो ख़ामख़ा उस से नाराज़ हो रहा है!
प्रताप सिंह: तुझे ठीक लग रही न बात, तो जा मर! तू ही मान उसकी हर बात, मैं तो जी भर के खाऊंगा! अभी न मरूंगा, आज तो दिन में गोलगप्पे भी खाऊंगा, बोल क्या कर लेगा, नी मानता में किसी की बात ओये!! हुंह! बड़े आये प्रताप सिंह को रोकने वाले!
मुकेश कुमार: हा हा हा ! एक तू और एक तेरा बेटा!! जाने किस खेत की उपज हो भाई!! तू भी कोई कम घोंचू नहीं है!!
प्रताप सिंह: अच्छा अच्छा! तू भी उड़ा ले मजा आज अपने दोस्त का!
मुकेश कुमार: ओये तू तो नाराज़ हो गया ओये! चल, तू सब कुछ खा लेना भाई! वो छोड़, ये बता, तेरी मुनीम जी कैसी है?
प्रताप सिंह: आदर्श कुमार कहता है कि 'सी ए' बोलो! अब ये भी कोई बात है, मन माफ़िक़ नाम भी न ले पाएं भाई!
मुकेश कुमार: अच्छा! बात तो गलत है! लेकिन ऑफिस आदर्श बेटे का है, तो बॉस जैसा बोले, मानना तो पड़ेगा भाई!
प्रताप सिंह: मुनीम जी बोलने में जो प्रेम और आत्मीयता लगती है, वो 'सी ए' बोलने में नहीं आती भाई मुकेश कुमार! इक ते बड़ी चंगी कुड़ी है, उस पर काम भी आला दर्जे का करती है! खुद ही जी करता है कि मुनीम जी बोलें उसको।
मुकेश कुमार: हाँ भाई प्रताप सिंह, तेरा जो मन करे, तू उसी नाम से बुलाया कर, हर वेले थोड़े न सबकी परवाह करदा फिरेगा भाई!
प्रताप सिंह: भाई, मेरी बेटी की याद आ जाती है उसनूं देख कर। तू तो जानता है, कैसी सोणी कुड़ी थी मेरी लाड़ली! पढ़ लिख कर 'सी ए' बन गई तो उसको मुनीम जी ही कहते थे हम घर में।
मुकेश कुमार: अवनी बिटिया को कोई कैसे भूल सकता है भाई!! बड़ी ही समझदार और प्यारी बच्ची थी तेरी! कुदरत को भी इतनी पसंद थी कि समुन्दर लील ले गया उसनूं! (आवाज़ भर्रा जाती है दोनों की )
प्रताप सिंह: हाँ मेरे भाई, जवान बच्चे का दुःख एक पिता से अधिक कौन समझ सकता है!! वो तो अपने पति के साथ हनीमून मनाने गई थी, सुनामी आ जाएगी, यह कौन जानता था!! कौन जानता था कि कदि वापस ही न आएंगे वो दोनों? कौन जानता था कि उसके ग़म में उसकी माँ की जान ही निकल जाएगी? रब ही जाणे मुझे क्यों ज़िंदा छोड़ दिया? हुंह!! (एकदम कम आवाज़ में बोलता है)
मुकेश कुमार: ओये ! ऐसा नहीं बोलते प्रतापे! तू न होता तो आदर्श बेटे का कौन ख्याल करता, बोल?
प्रताप सिंह: ओये तू उल्टा बोल रहा है, मैंने नहीं बल्कि आदर्श ने ही मेरा ध्यान रखा है भाई, नहीं तो बेटी दामाद और पत्नी के दुःख में मैं कब का पागल हो गया होता! (गला भर्रा गया)
मुकेश कुमार: तू सच्ची बड़ा घोंचू है भाई प्रतापे, इक वेले बोलता है कि वो तुझ पर हुकुम चलता है, दूजे वेले बोलता है कि वो ही तेरा ध्यान रखदा है!
प्रताप सिंह: आहो! तो की मैं झूठ बोल्या सी? दोनों ही गल्लां सच्ची है भाई मुकेश कुमारे!
मुकेश कुमार: ओये! मैं तो कहूं, तू उस कुड़ी नूं अपनी बहु बना ले।
प्रताप सिंह: सौ प्रतिशत यही तो! तुझे क्या लगा, क्या मैं नहीं सोचा था ऐसा? मगर, तेरा भतीजा आदर्श कुमार माने तब तो बात बने! कहता है, पिता का ध्यान रखने के लिए एक वही काफी है, अब यह भी कोई बात हुई भला? मैं तो इक दिन मर जाऊँगा, तब उसका ध्यान कौन रखेगा भला? हुँह!
मुकेश कुमार: ओये , तू चिंता न कर, वो मान जाएगा इक न इक दिन! तू बोले तो मैं मनाता हूँ न उसको।
प्रताप सिंह: हाँ, हाँ, तेरा ही सगा भतीजा है,शायद तुझ से ही मान जाए! एक काम कर, आज शाम को ही उससे बात करते हैं, तू शाम को मेरे घर आजा।
मुकेश कुमार: चल. ठीक है भाई, आज तेरे घर पर ही डेरा डालूंगा। अब पोहा जलेबी समोसा खा लें, फिर पैदल ही घर चलते हैं।
प्रताप सिंह: वाह रे भाई! ये की न तूने दोस्तों वाली बात! चल चल, जल्दी चल! पहले पेट पूजा, पीछे काम दूजा।
(दुकान पर चहल पहल की आवाज़ आती है कुछ पल, 'एक प्लेट जलेबी और दो प्लेट पोहा लगा दो बेटा जी!' फिर शांति हो जाती है।)

दृश्य 5
शाम को वे प्रताप सिंह के घर पर बैठे बातचीत कर रहे थे, सिमरन यानि मुनीम जी और आदर्श बेटा भी वहाँ आए हुए थे. सिमरन के साथ एक छोटा ढाई साल का बच्चा था.
प्रताप सिंह: अरे! यह प्यारा सा यह बच्चा किसका है भाई? इधर आओ बच्चे! क्या नाम है आपका बेटा? (ख़ुशी के स्वर में)
बच्चा - वीर सिंह
प्रताप सिंह: अरे वाह! बड़ा होनहार नाम है वीर सिंह! बड़े बहादुर हो आप तो!
बच्चा - हाँ जी, मम्मा कहती है कि मैं उसका ब्रेव सोल्जर हूँ। (तोतली बोली में)
प्रताप सिंह: ओये क्या बात कही शेर दे पुत्तर! अच्छा बताओ, आपकी मम्मा का क्या नाम है बेटा ?
बच्चा - सिमरन!
प्रताप सिंह चौक पड़े!
आदर्श कुमार: यह सिमरन का बेटा है पापा! (गंभीर स्वर में)
प्रताप सिंह: सिमरन का बेटा है? क्या बोल रहे हो बेटा जी?
आदर्श कुमार: जी पापा, सच बोल रहा हूँ। सिमरन भी यहीं है, आप उसी से पूछ लो!
प्रताप सिंह: अच्छा! हमें तो अंदाज़ा भी न था कि सिमरन शादीशुदा है और उसे एक बच्चा भी है!!
प्रताप का दोस्त मुकेश कुमार भी चौंक गया
मुकेश कुमार ने चौंकते हुए कहा - अच्छा! तो अब तो यह शादी हो नहीं सकती है भाई, तो मैं ... (प्रश्नवाचक स्वर)
आदर्श कुमार: क्या कहा अंकल! किसकी शादी की बात है?
प्रताप सिंह: (पिता ने बड़ी दुखी स्वर में कहा) तुम्हारी और सिमरन की शादी!
आदर्श कुमार – पापा, पहले आपसे इस बारे में बात नहीं हो पायी है, वो,… एक्चुअली सिमरन की शादी तीन साल पहले हो गई थी. जब उन्हें बेटा पैदा हुआ तो उसके एक साल बाद सिमरन के पति एक कार एक्सीडेंट में चल बसे.
प्रताप सिंह: ओह! यह सब कुछ तो हमें पता ही नहीं था!!
आदर्श कुमार: जी पापा, उसके बाद से सिमरन अपना पूरा ध्यान अपने बेटे की पढ़ाई में देती आ रही है और वह चाहती है कि उसका बेटा भी बहुत अच्छी एजूकेशन पाए, इसलिए वह दिन रात मेहनत करती है.
प्रताप सिंह: माफ़ कर देना बेटा सिमरन जी! (निराश स्वर में)
सिमरन: सर, आप बहुत अच्छे हैं, आप तो हमेशा मुझे बेटी की तरह स्नेह करते हैं, आप माफ़ी न ... (कोमल स्वर में)
प्रताप सिंह: मेरी बेटी भी तुम्हारी तरह सी ए थी बेटा ! और हम सब उसे घर में मुनीम जी कहते थे, बदकिस्मती से वो अब इस दुनिया में नहीं है। आपको जब देखता हूँ उसकी तरह ही लगती हो आप, इसलिए आपको भी मुनीम जी कहता हूँ बेटा! (भीगे स्वर में)
सिमरन: मुझे हमेशा ही आपका मुनीम जी शब्द सुनकर बड़ी खुशी होती है सर।
प्रताप सिंह: बेटा जी, आपको बुरा न लगे तो मैं आपको अपनी बहु बनाना चाहता हूँ। आप चाहो तो... मैं आपके परिवार वालों से बात कर सकता हूँ।
सिमरन: सर... उस कार एक्सीडेंट में मेरे सास ससुर और पति, सब... (आर्द्र / दुखी स्वर)
प्रताप सिंह: ओह वाहेगुरु! एही रब दी मर्जी है ! हम भी ऐसे ही दुःख के मारे हैं! देखो बेटा! तुम बिलकुल चिंता न करना, अब से हम ही तुम्हारा परिवार हैं, तुम अपने बेटे वीर सिंह के साथ यहीं हमारे साथ रहोगी अब से। वीर के साथ हमें खूब खेलना है! देखो, इनकार न करना मुनीम जी!
सिमरन: जी सर, आप जैसे अच्छे इंसान मिलना मेरा बड़ा अच्छा नसीब है, आपके परिवार में शामिल करने के लिए मैं आपका और अपने रब का शुकराना अदा करती हूँ। वीर आज से आपका पोता हुआ। (कृतज्ञ भाव से)
प्रताप सिंह: हाँ तो आज से सर कहना बंद करो मुनीम जी! बताओ क्या कहोगी? (चहकते हुए)
सिमरन: पापाजी! (हँसकर)
प्रताप सिंह: अब ठीक है! चैन आ गया सुनकर, बरसों बाद बेटी मिली है भाई मुकेश कुमार, लो मिठाई खाओ!
मुकेश कुमार: बेटी या बहू? (ठिठोली के स्वर में)
प्रताप सिंह: बहू के रूप में बेटी! यानि टू इन वन! (प्रसन्नता के स्वर में)
मुकेश कुमार: हाँ हॉं! तेरे तो वाहेगुरु की दया से नसीब चमक गए। ( ख़ुश हो कर )
प्रताप सिंह: रब दी मेहर भाई, होनहार बेटे को क़ाबिल बहू मिल गई, रब दी लख मेहर हो गई!
मुकेश कुमार: बेटे से तो पूछ ले एक बर भाई!
प्रताप सिंह: ज़रूर पूछता भाई, लेकिन देख न, बेटा कैसा लाल टमाटर हुआ जा रहा है! अब इतना तो बेटे के दिल की बात समझने लायक़ हो गया हूँ भाई!
आदर्श कुमार: वाह वाह! तुस्सी ग्रेट हो पापा!
मुकेश कुमार: ओये! दोस्त किसका है!! (हँसते हुए कहता है)
आदर्श कुमार: पापा किसके हैं! (हँसते हुए कहता है)
वीर सिंह- दादाजी किसके हैं!! (तोतली बोली में)
सब हँसने लगते हैं
प्रताप सिंह: हा हा! तुम सब लोग हो मेरे साथ, मेरी खोई हुई बेटी भी मुनीम जी के रूप में लौट आई, रब दा लख लख शुक्र है! (हँसते हुए, फिर कोमल भाव से कहता है)

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